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Saturday, October 18, 2014

बीच बहस में कविता - 25 : नीलोत्पल की कविता 'सवाल यह है'



नीलोत्पल हमारे दौर के समझदार कवि हैं जिनके पास समय की नब्ज़ पर हाथ रखकर उसकी सेहत के बारे में जान लेने का हुनर और हौसला है | ‘सवाल यह है’ कविता में वे हथियार, बाज़ार और प्यार के त्रिकोण के साथ अपने पाठक को किसी एक को चुन लेने की विकट स्थिति के सामने ला खड़ा करते हैं | वे पूछते हैं कि इनमें से वह किस चीज़ से इस दुनिया को बचाना चाहेगा | जाहिर है कि प्यार से दुनिया को कोई खतरा नहीं है बल्कि प्यार ही वह चीज़ है जिस पर बाज़ार और हथियार के समय में बचे रहने का संकट है | कविता में केदारनाथ सिंह की चिंता है कि नन्हा गुलाब कैसे बचेगा | इससे आगे बद्रीनारायण की चिंता है कि प्रेमपत्र को कैसे बचाया जाएगा | नीलोत्पल सिर्फ बचने और बचाने की बात ही नहीं करते बल्कि सामने मौजूद खतरे की बात भी करते हैं | 
एक तरफ बाज़ार है जहाँ सबकुछ पण्य है, बिकाऊ है | बाज़ार में आदमी से ज्यादा पैसे की कद्र है | बाज़ार में आदमी की खरीदने की क्षमता ही उसकी एकमात्र काबिलियत है | उसका एकमात्र लक्ष्य है मुनाफा | इस बाज़ार में उस ह्रदय का क्या मोल जिसमें प्रेम भरा हुआ है | कहा जाता है, और सच ही कहा जाता है कि बाज़ार बड़ा क्रूर होता है | उसकी नज़र आदमी के दिल पर नहीं उसकी जेब पर टिकी होती है | जिसे हम बोलचाल की जुबान में औकात कहते हैं वह इस बाज़ार में पैसे से तय हुआ करती है | यहाँ इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि सामने खड़े आदमी के ह्रदय में कितना प्यार है | प्यार वह उदात्त मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति किसी दूसरे के लिए जीने लगता है | वह सामने वाले कि छोटी से छोटी खुशी की खातिर अपना सबकुछ दाव पर लगा देता है | वह देना जानता है, पाने के बारे में नहीं सोचता | प्यार से ही यह दुनिया सुन्दर है | जरूरी नहीं कि जब हम प्यार की बात करें तो उसके केंद्र में आशिक और माशूका ही हों | प्यार की व्याप्ति इससे बहुत आगे तक है | अपनी अंतिम ऊंचाई में यह प्यार एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के लिए आपस का भाव है | नीलोत्पल अपनी इस कविता में प्यार की इसी उंचाई को लक्ष्य करते हैं | उनकी चिंता इस प्यार को बचाने की है | लेकिन वे सामने मौजूद खतरों को भी देख रहे हैं | 
बाज़ार को जीत कर आदमी क्या हासिल कर सकता है | कवि उसकी परिणति जानता है | बाज़ार को जीतने वाला सबकुछ खरीद सकता है | वहाँ सबकुछ उसकी मर्ज़ी से तय होता है | वह जो भी करता है उसे सही कहा जाता है | लेकिन इस बाज़ार में उसकी एक हार उसके लिए मौत की तरह आती है | कवि कहता है वह अपनी हार के बारे में सोचते ही मारा जाएगा | वास्तव में इतना ही निर्मम, इतना ही क्रूर है बाज़ार | बाज़ार में जीतने के लिए आदमी सही गलत का फर्क भूल जाता है | वह न्याय अन्याय का भेद भूल जाता है | यहाँ टिके रहने के लिए उसे शक्ति की, बल की जरूरत पड़ती है | और जरूरत पाती है हथियारों की | बाजार का विजेता इतना डरा हुआ होता है कि आत्मरक्षार्थ हथियारों का भी आश्रय लेता है | वह प्रयोजन के अनुसार युद्ध के उन्माद को भी आमंत्रित करने में नहीं हिचकता | वह हथियारों का ढेर लगा कर भी असुरक्षित महसूस करता है | नीलोत्पल कहते हैं हथियार के पक्ष में खड़े होने के बाद उसके पास कटे उजाड़ जंगल बचते हैं जिसमें पेड़ के तले एक चिड़िया दबी पड़ी होती है | कवि इस चिड़िया की आँख में बचे सपने की तरफ संकेत करता है | किन्तु यह सपना ऐसा है जिसे अपने साथ घर नहीं ले जाया जा सकता | वह हाथ से छूते ही टूट जाता है |  हथियार और सपने का आपसी रिश्ता नीलोत्पल को पता है | उन्हें पता है जहाँ हथियार है वहाँ सपनों के परिंदे ज़िंदा नहीं रहा करते | 
सपने जहाँ बचे रहते हैं वह दुनिया प्यार की दुनिया है | कवि कहता है इस दुनिया में दीवारों में चुने जाकर भी तुम लोगों की उम्मीदों में बचे रहोगे | यहाँ दुःख जरूर हैं | तकलीफें हैं यहाँ | उदासियाँ हैं इस दुनिया में | लेकिन यही वह दुनिया है जहाँ जिस्म पर जख्मों के फूल खिलते हैं और होठों पर एक कभी न मुरझाने वाली मुसकान तैरती है | यह दुनिया जिस आदमी का चुनाव है वह दुनिया के हर दुःख में बिखर कर भी अपने लोगों में उम्मीद की तरह जीता रहता है | नीलोत्पल की यह कविता शाश्वत प्रेम की कविता है | यहाँ हार नहीं | यह आग का वह दरिया है जिसके बारे में ग़ालिब कहते हैं ‘जो डूबा सो पार’ | 
नीलोत्पल की यह कविता वास्तव में बाज़ार-हथियार-प्रेम के त्रिकोण में अपना अवस्थान तय करने की कठिन चुनौती के साथ अपने पाठक को उस अभ्यास से बाहर आने को विवश भी करती है जहाँ उसे दो में से किसी एक को चुनना होता था | भावोच्छ्वास को ही प्रेम कविता जानने समझने की अभ्यस्त आँखों के लिए यह कविता एक जरूरी पाठ है | 
 
कविता : 
सवाल यह है
तुम किस चीज़ से
बचाना चाहोगे दुनिया को
हथियार से,
बाज़ार से,
या प्यार से

हथियार अगर तुम्हारी ज़रूरत हैं
तो तुम दुनिया नहीं
ख़ुद को बचाना चाहते हो

अगर तुम बच गए
तो समझो तुम एक जंगल के बीच हो
जहाँ कटे पेड़ों के नीचे
दबे परिंदों की आँखों में
एक ख़ूबसूरत सपना है
तुम चाहते हो
उसे घर ले आया जाए
लेकिन जैसे ही छूते हो तुम
वह टूट जाता है

तुम अगर बाज़ार को चुनते हो
तो निश्चित ही जहाँ तुम दाँव फेंकोगे
तुम्हें अपने ख़रीदे प्रतिरूप दिखाई देंगे

यह दुनिया कमोडिटी की तरह होगी
जहाँ तुम तय करोगे भाव
और उसके उतार-चढ़ाव

तुम्हारी जीत-ही-जीत होगी
लेकिन जैसे ही तुम सोचोगे
अपनी हार के बारे में
मारे जाओगे

तुम अगर प्रेम के साथ हो
तो कहना मुश्क़िल है
तुम उदास नहीं होओगे

बल्कि हर अवसर पर घेरा जाएगा तुम्हें
कई दीवारों के भीतर चुने जाते हुए
जब तुम मुस्कराते मिलोगे
बरसों बाद भी
लोग निराश नहीं होंगे
जैसे ही तुम बिखर जाओगे
दुनिया के हर दुख में

Thursday, October 10, 2013

बीच बहस में कविता -24 : राकेश रोहित की कविता "लोकतन्त्र में ईश्वर"


 

















अच्छी कहानी वह है जिसमें कविता हो और अच्छी कविता वह जिसमें कहानी । राकेश रोहित की इस एक कविता में न जाने कितनी कहानियाँ है । ऊपर से पंचतंत्र की कहानियों की याद दिलाने वाले किस्सों की प्रासंगिकता ऐसी कि मौजूदा समय में जनतंत्र के अंतर्विरोधों की कलई खुल जाती है, इन्हें पढ़ते हुए । कविता में चूहे हैं, केकड़े हैं, मेंढक है, और शुतुरमुर्ग, लोमड़ी, सारस, बंदर, बिल्ली, शेर, टिटिहरी भी । ये सब प्रकारांतर से आदमी के ही अलग-अलग रूपक हैं । जनतंत्र में इन अलग-अलग जीव-रूपों में आदमी है और इन सबको इनके इस हाल में देख कर जो हँस रहा है वह भी आदमी ही है । यह जैविकी का एक अद्भुत पिरामिड है जिसमें निचले स्तर से लेकर सबसे ऊपर वाले स्तर तक आदमी ही आदमी हैं, एक दूसरे का शिकार करते हुए ।

एक दृश्य है जिसमें अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल आदमी है । यह साधारण जन हैं इस फलते-फूलते जनतंत्र में जिनके लिए आज भी पहली चिंता रोटी है । रोटी और रोजगार आज भी जिस समय में मनुष्य को सहज उपलब्ध नहीं एक ऐसे समय में कल्पना की जा सकती है कि इन प्राथमिक आवश्यकताओं कि पूर्ति के लिए उनमें आपस में किस तरह की होड़ होगी । अन्न से अधिक मुँह, रोजगार से अधिक हाथ और रोटी से बड़ी भूख, आपसी होड़ पैदा करते हैं । संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों का कब्ज़ा है । ऐसे में क्या आश्चर्य कि एक आदमी केकड़े की तरह अपने ही जैसे दूसरे आदमी की टांग खींचने के अमानुषिक विकल्प को चुन लेता है । यहीं से होड़ के लिए स्थितियाँ तैयार होती हैं ।

यहीं दूसरी ओर कूप-मंडूक आदमी है, शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए आँधी के गुज़र जाने का इंतज़ार करता आदमी है । यह यथास्थितिवाद का समर्थक वर्ग है । इस व्यवस्था में जो सुविधाजनक स्थिति में है उसके लिए दुनिया सावन के अंधे की तरह सदा हरी-भरी है । कुंए के मेढक को बाहरी दुनिया की हलचल का ज्ञान नहीं है । उसे बाहरी हलचल में दिलचस्पी भी नहीं है । ऐसे लोगों से बदलाव की कोई उम्मीद करना बेकार है । जिन्हें ज़रा सा भी खतरा उठाना पसंद नहीं वे आंधियों को सर झुका कर गुज़र जाने देते हैं । अपनी रीढ़ को लगातार नरम और लचीला करता हुआ एक बुद्धिजीवी वर्ग ऐसे में अनायास याद आता है । उसके लिए संस्थानों की नौकरियाँ हैं, अकादमियों की लुभाती कुर्सियां हैं, पद-पुरस्कार और पैसा है । वह अपने कुंए में उछल-कूद करके अपने कर्तव्य की इति-श्री मान लेता है ।

पूंजी की लोमड़ी का पेट बहुत बड़ा है । उसने प्रलोभनों की थाली सजाई है । उसे अपना शिकार चाहिए । यह बाज़ार का हाल-हकीकत है जो कविता में प्रभावी ढंग से आता है । बाज़ार का न्याय बंदर का न्याय साबित होता है । यह पूंजी और सत्ता का साझा खेल है जिसमें साधारण आदमी हर बार ठगा जाता है । ऐसे में हमारी सामूहिक ताकत का क्या होता है । वह अपनी परछाईं से डरे हुए शेर की तरह भ्रमित है । अपनी परछाईं से डरा शेर अंततः अपनी ही परछाईं से लड़ने के लिए कुंए में कूद जाता है । यह व्यवस्था की जीत है । संगठित मनुष्य को एक दूसरे से लड़ा कर व्यवस्था अंततः उसकी संगठित शक्ति का ही आखेट करती है ।

अब जो बच जाता है वह है दुनिया को बचा ले जाने के भ्रम में जीता आदमी, जैसे आकाश को गिरने से रोकने की कोशिश में अपनी टांग उठाए टिटिहरी । जैसे आकाश को अपने पंजों के नीचे महसूस करती चिड़िया । और जो सबसे ताकतवर आदमी है वह इस मूर्खता पर हँसता है । दरअसल यह वही आदमी है जिसे जन साधारण ने अपनी परेशानियाँ दूर करने के लिए चुना है । वह जनता का निर्वाचित प्रतिनिधि है जो जनतंत्र में ईश्वर हो चुका है । उसे जनता के दुख-सुख से भला क्या लेना-देना । राकेश रोहित अपनी कविता में बहुत सादगी के साथ अपने पाठक को लोकतंत्र के अभयारण्य की सैर पर ले चलते हैं ।


लोकतंत्र में ईश्वर..

(राकेश रोहित)

एक आदमी
चूहे की तरह दौड़ता था
अन्न का एक दाना मुँह में भर लेने को विकल।
एक आदमी
केकड़े की तरह खींच रहा था
अपने जैसे दूसरे की टाँग।
एक आदमी
मेंढक की तरह उछल रहा था
कुएँ को पूरी दुनिया समझते हुए।
एक आदमी
शुतुरमुर्ग की तरह सर झुकाए
आँधी को गुज़रने दे रहा था।
एक आदमी
लोमड़ी की तरह न्योत रहा था
सारस को थाली में खाने के लिए।
एक आदमी
बंदर की तरह न्याय कर रहा था
बिल्लियों के बीच रोटी बाँटते हुए।
एक आदमी
शेर की तरह डर रहा था
कुएँ में देखकर अपनी परछाईं।
एक आदमी
टिटहरी की तरह टाँगें उठाए
आकाश को गिरने से रोक रहा था।
एक आदमी
चिड़िया की तरह उड़ रहा था
समझते हुए कि आकाश उसके पंजों के नीचे है
एक आदमी...!
एक आदमी
जो देख रहा था दूर से यह सब,
मुस्कराता था इन मूर्खताओं को देखकर
वह ईश्वर नहीं था
हमारे ही बीच का आदमी था
जिसे जनतंत्र ने भगवान बना दिया था ।

Thursday, September 5, 2013

बीच बहस में कविता - 23 : कविता का लोक अर्थात अपने आदमी की खोज

1.

कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं , “मोर नाम एई बोले ख्यात होक , आमि तोमादेर-ई लोक” | वे अपनी पहचान ही इस रूप में चाहते हैं कि लोग उन्हें अपना आदमी ही जानें |  

आमतौर पर लोक की बात आते ही स्वर्गलोक और  मर्त्यलोक (स्वर्ग और नर्क) , इहलोक और परलोक , देवलोक और नागलोक जैसी पुरातन अवधारणाएँ अवचेतन से बाहर आने लगती हैं | यहाँ लोक का प्रचलित अर्थ संसार है | साहित्य , ख़ास तौर पर कविता में लोक की बात करते हुए इन रूढ़ विचारों से बहुत मदद नहीं ली जा सकती | लेकिन इन विचारों को एकदम से दरकिनार भी नहीं किया जा सकता | ये भी उसी लोक के विचार हैं जो साहित्य में और कविता में हमारी चिंता के केंद्र में है, अर्थात समाज के निचले पायदान पर खड़ा साधारण आदमी | वह साधारण आदमी समाज के शासक वर्ग अथवा प्रभु वर्ग का विलोम रचता है | यहाँ किसी प्रचलित शब्दावली के अनावश्यक प्रयोग से बचना चाहिए क्योंकि ऐसी कोई भी शब्दावली लोक को उसके अर्थों में सीमित कर देने जैसी बात होगी | उदाहरण के लिए यदि हम उसे सर्वहारा कहते हैं तो उससे ऐसे लोगों को अलग करना होगा जिनके पास थोड़ा सा भी संबल जीने के लिए बचा हुआ है , अर्थात जिसने अपना सर्वस्व नहीं गंवाया है लेकिन फिर भी शोषित है | कविता का लोक तब कौन है यह बात शुरू में ही साफ हो जानी चाहिए | साहित्य और कविता के इलाक़े में गरीबी रेखा जैसी कोई चीज़ नहीं हुआ करती | यहाँ कसौटी यह है कि वह व्यक्ति पीड़ित है अथवा पीड़क , दुखी है कि दुख देने वाला है | यदि वह पीड़क है, दुख देने वाला है तो हमारे लिए शासक अथवा प्रभु वर्ग का प्रतिनिधि है | उससे मुक्ति ही लोक संघर्ष का सबसे बड़ा आधार है | रवीन्द्र नाथ ठाकुर की बात पर लौटें तो कविता में हम बार-बार जिस लोक की बात करते हैं वह प्रथमत: और अंतत: हमारा “अपना आदमी” ही होता है | लोक बृहत्तर अर्थ में हमारा अपना आदमी ही है | कविता के आलोचक की ज़िम्मेदारी यह भी बनती है कि वह इस “अपने आदमी” का अनुसंधान करे और उसके पक्ष को सामने लाए | लोक कोई इकहरी अवधारणा नहीं है | उसकी संरचना बहुपर्तदार है, संश्लिष्ट है |

जरा हिन्दी के लोकगीतों को याद करें | कैसा है उसका सत्ता विमर्श अथवा पावर डिसकोर्स ? यह अद्भुत बात है कि  लोक पर जिस राजा का शासन है उस लोक के दमित स्वप्नों में एक बड़ा स्वप्न उसी तरह का राजा बनना भी है | ऐसे तमाम लोकगीत मिल जाएंगे जिनमें माता-पिता अपने बेटे-बेटियों को राजकुमार- राजकुमारी के रूप में देखना चाहते हैं | लड़कियों के सपनों में राजकुमार ही आता है, कोई मजदूर नहीं | लड़के अपने लिए राजकुमारियों का ख़्वाब बुनते हैं | एक गरीब आदमी भी जब अपने लिए वैभव की कल्पना करता है तो उस कल्पना में वह राजा ही होता है जहां उसके नौकर-चाकर होते हैं , जहां उसे श्रम नहीं करना होता है | ऐसे में वर्ग शत्रु की अवधारणा के बारे में पुनर्विचार करना कम जरूरी नहीं | ये पंक्तियाँ लिखते हुए मुझे इस बात का अहसास है कि विद्वानों की भृकुटियाँ इसे पढ़ते हुए तन रही होंगी | लेकिन यह एक सच है | इसे स्वीकार करना होगा | यह अलग शोध का विषय हो सकता है | लोक का अवस्थान , उसकी सीमाएं और सामर्थ्य , उसके संघर्ष , उसके जय-पराजय , दुख-सुख , कुल मिला कर उसका एक लेखा-जोखा कैसा है | क्या लोक कोई प्रश्नातीत , पवित्र और दैवीय विचार है ? नहीं | पूरी सहानुभूति रखते हुए भी लोक को उसके अंतर्विरोधों के साथ ही समझना होगा |

 

2.

“किन्तु वह फटे हुए वस्त्र क्यों पहने है

उसका स्वर्ण वर्ण मुख मैला क्यों है

वक्ष पर इतना बड़ा घाव कैसे हो गया

उसने कारावास दुख क्यों झेला है

उसकी इतनी भयानक स्थिति क्यों है

रोटी उसे कौन पहुंचाता है

कौन पानी देता है

फिर भी उसके मुख पर स्मित क्यों है

प्रचंड शक्तिमान क्यों दिखाई देता है” [“अँधेरे में” - मुक्तिबोध]

 
मुक्तिबोध अपनी लंबी कविता में ये सवाल पूछते हैं | कविता का “वह” कौन है ? क्या यह लोक की सामूहिक चेतना नहीं है , उसकी आत्मा – कवि की परम अभिव्यक्ति ? इस परम अभिव्यक्ति का साक्षात्कार कवि की उपलब्धि है | “अँधेरे में” कविता इसी साक्षात्कार का दस्तावेज है |

ध्यान रहे कि कविता जहां से शुरू होती है वह जगह जिंदगी का एक अँधेरा कमरा है | कैसी है यह अंध कारा ? क्या घटित  हो रहा है इस अंध कारा के भीतर ? दृश्यावलियों की एक अविरल कड़ी है यह लंबी कविता जिसमें अपने समय और समाज का चेहरा दिखाई देता है | इस लंबी कविता के कई टुकड़ों को स्वतंत्र कविता के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, जैसा कि कई बार देखने में भी आता है | यह कविता एक लंबी फीचर फिल्म की तरह है |

“वह कौन, सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई” | इस अज्ञात की खोज में कवि भटकता है | दुनिया एक तिलिस्मी खोह में बदल जाती है | इस खोह में गहन अँधेरा है | इस अँधेरे में जैसे कहीं रोशनी पड़ती है और कुछ दृश्य परदे पर उभरते हैं | कवि इन दृश्यों के पीछे पीछे भागता है | दृश्य में सक्रिय एक जानी पहचानी दुनिया है | उस जानी पहचानी दुनिया में किसी चश्मदीद गवाह का होना बेहद खतरनाक है | लिहाजा कवि, जिसने इन दृश्यों को न सिर्फ देखा है बल्कि उसमें चमकते चेहरों को पहचान भी लिया है , अब उनके लिए बेहद खतरनाक है | वे इस गवाह की हत्या कर देना चाहते हैं | इस पूरी कविता में एक तिलिस्मी दुनिया दिखाई देती है | सबसे पहले जो बिम्ब कविता में उभरता है वह दीवार की पपड़ियों के खिसकने से बना एक चेहरा है – नुकीली नाक , भव्य ललाट , दृढ़ हनु | दूसरा बिम्ब शहर के बाहर तालाब के काले जल के शीशे में उभरता है – बड़ा चेहरा , फैलता और मुसकाता | तीसरा बिम्ब , जंगल के पेड़ों के ऊपर चमकती बिजली और उसमें उभरता एक तिलिस्मी खोह का दरवाजा – लाल मशालों की रोशनी में रक्तालोक स्नात पुरुष , गौर वर्ण , दीप्त दृग , सौम्य मुख , भव्य आजानुबाहु | यह रहस्यमय व्यक्ति कौन है ? कवि का उत्तर है कि वह उसकी अब तक न पाई गई अभिव्यक्ति की पूर्ण अवस्था है | अर्थात जो है और जो चाहिए उसके बीच के तनाव में आविर्भूत आत्म चेतना | पुन: उन प्रश्नों पर लौटें - किन्तु वह फटे हुए वस्त्र क्यों पहने है , आदि आदि , तो प्रश्नकर्ता को सजा मिलती है | जंगल से आती हवा उन मशालों को ही बुझा देती है | वह पुन: अँधेरे में , आहत और अचेत पड़ा मिलता है | यह उसकी सजा है |

कल्पना की जा सकती है कि वह कैसा समाज होगा जहां सवाल करने की ऐसी सजा मुकर्रर है | कोई बाहर से सांकल बजाता है | लेकिन अंधेरे खोह में वह क्षत विक्षत पड़ा है , इस कदर कि उठ भी नहीं सकता | यहाँ मुक्तिबोध एक विलक्षण बात कह जाते हैं | वे कहते हैं कि शक्ति ही नहीं यह तो ठीक है परंतु  “यह भी है तो सही है कि / कमजोरियों से ही मोह है मुझको” | इसलिए वह कतराता है , डरता है , टालता है उस सांकल बजाने वाले को , जिसे देख प्यार भी उमड़ता है और जो हृदय को बिजली के झटके देता है | लेकिन वह भी इतना ढीठ कि कवि को उठा कर तुंग शिखर के खतरनाक खुरदुरे कगार पर बैठा देता है और कहता है , “पार करो पर्वत–संधि के गह्वर / रस्सी के पुल पर चलकर / दूर उस शिखर कगार पर खुद ही पहुँचो” | गहरे द्वंद्व के बाद बड़ी मुश्किल से जब अशक्त व्यक्ति जंग खाई चिटखनी खोलता है तब तक वह परम अभिव्यक्ति जा चुकी होती है | यह “टू बी ऑर नॉट टू बी” का द्वंद्व है | कविता का निहितार्थ क्या हो सकता है यहाँ | मैं इस कविता के संदर्भ में यह अर्थ ग्रहण करने की छूट लेना चाहूँगा कि समाज के भीतर लोक की दमित चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति तभी संभव है जब वह खुद इसके निमित्त सचेष्ट हो | उसे अपनी आत्मशक्ति को पहचानना होगा | परम अभिव्यक्ति बार बार दरवाजे पर दस्तक नहीं देती | उसके पीछे चलने के खतरे हैं जिन्हें उठाए बिना उस तक पहुँचना संभव नहीं है | इस अर्थ में “अंधेरे में” कविता व्यक्ति अथवा लोक के आत्मसंघर्ष की महागाथा है |

एक मनोवैज्ञानिक , चिकित्सक की दृष्टि से देखें तो कई बार कविता का प्रथम पुरुष “डिमेन्शिया” का मरीज प्रतीत होता है | यह आधा स्वप्न आधा जागृति की अवस्था है जहां घटनाएँ फिल्म की रील की तरह उभरती और बुझती हैं | “पीटे गए बालक सा मार खाया चेहरा / उदास इकहरा / स्लेट पट्टी पर खींची गई तसवीर / भूत जैसी आकृति” देखते हुए अपने सिविल लाइंस के कमरे में पड़ा कवि प्रश्नाकुल  है कि कहीं यह उसी का चेहरा तो नहीं | आसमान में सितारों के बीच तोल्स्तोय का चेहरा दिखता है | यह कवि के “किसी भीतरी धागे का आखिरी छोर” है | मध्य रात्रि में नगर में बैंड की धुन पर चलता जुलूस देखिए – सड़क यहाँ एक खींची हुई काली जीभ है, और बिजली के दिये मरे हुए दांतों का चमकदार नमूना | क्या शोभा यात्रा किसी मृत्यु दल की ? विचित्र प्रोसेशन , क्विक मार्च ! बैंड वालों में कई प्रतिष्ठित पत्रकार नगर के | देखे हुए जाने पहचाने चेहरे | कई प्रकांड आलोचक , विचारक , जगमगाते कविगण , मंत्री , उद्योगपति , विद्वान , और शहर का कुख्यात हत्यारा डोमाजी उस्ताद – सब यहाँ दिखते भूत पिशाच काय | इस प्रोसेशन से आवाज आती है – “मारो गोली , दागो स्साले को एकदम !” कवि भागता है और इस नतीजे पर पहुंचता है कि “यह सब क्या है / किसी जन क्रान्ति के दमन निमित्त यह / मार्शल लॉ है !!” यहीं पर कविता अपने लोक से सीधे जुड़ जाती है | कहना पड़ता है कि यह व्यक्ति संघर्ष की कविता ही नहीं बल्कि लोक संघर्ष की कविता भी है | इन पंक्तियों पर ध्यान दें तो बात और भी स्पष्ट होती है –

“सामने ही अंधकार स्तूप सा

भयंकर बरगद

सभी उपेक्षितों , सभी वंचितों

गरीबों का वही घर , वही छत

उसके ही ताल खोह अंधेरे में सो रहे

गृहहीन कई प्राण” |

वह भागता है – भागता मैं दम छोड़ , घूम गया कई मोड़ ! आत्मालोचन करता है | उसी बरगद के पास | और इस आत्मालोचन से निकला प्रश्न – अब तक क्या किया , जीवन क्या जिया | इसी दरम्यान वह पाता है “विचारों की रक्तिम अग्नि के मणि” | एक गहरा अवसाद भरा पश्चाताप कि उसे “लोक-हित  क्षेत्र से कर दिया वंचित” | कवि कहता है , “खैर.. यह न समय है , जूझना ही तय है” | यहाँ कवि अपने पाठक को एक एजेण्डा पकड़ा देता है |

कविता में तिलक और गांधी भी आते हैं | तिलक की नासिका से बहता गरम खून देखकर कवि भावुक हो, कहता है – “हम अभी जिंदा हैं , चिंता क्या है” | गांधी कवि को एक शिशु सौंपते हुए कहते हैं – “संभालना इसको , सुरक्षित रखना” | अब इसके बाद की कविता विचारों पर आधारित खुले औए सीधे संघर्ष के दृढ़ निश्चय से होती हुई निर्णायक लड़ाई तक की यात्रा पर ले चलती है | नीली झील में प्रतिपल काँपता अरुण कमल – मुक्ति ही लक्ष्य है | लोक संघर्ष का इससे बेहतर काव्य क्या अन्यत्र कहीं है ? आज जो बड़े आराम से अभिव्यक्ति के  खतरे उठाने की बात करते हैं , मठ और गढ़ ढहाने की बात करते हैं , वे भूल जाते हैं कि इसके ठीक बाद की पंक्ति में ही कवि दुर्गम पहाड़ों के उस पार जाने की अनिवार्यता की बात भी करता है |

 

3.

लोक के प्रति पूर्ण आस्था और समर्पण की अनन्य कविता है अज्ञेय की “असाध्य वीणा” | असाध्य वीणा के साधक की कृतज्ञता तो प्रकृति के लघुतम अवयवों तक जाती है | कविता के केंद्र में राजा के दरबार में रखी मंत्रपूत वीणा है जिसे कोई कलावंत अब तक साध नहीं पाया था | यह वीणा तभी बोलेगी जब कोई सच्चा स्वरसिद्ध साधक उसे अपनी गोद में लेगा | कुछ आलोचक कविता को इस आधार पर लोक विरोधी बताते हैं कि इसमें कला साधक राजा के दरबार में अपनी कला का प्रदर्शन करता है | जैसा कि ऊपर के अनुच्छेदों में स्पष्ट किया गया है , लोक का राजा अथवा राज दरबार के साथ व्यवहार इकहरा नहीं रहा है | जिस राम राज्य के प्रति भारतीय लोक के मन में गहरी श्रद्धा और अगाध आस्था रही है वह भी एक राजा की ही मूर्ति है | और यहाँ तो राजा इस कला साधक को तात कह कर संबोधित करता है | प्रियंवद के समक्ष केवल राजा-रानी ही नहीं हैं , उस सभा में “जन” भी हैं | यह जन की आकांक्षा भी है कि अभिमंत्रित वीणा को साध ले, ऐसा कोई साधक आए | असाध्य वीणा के तार क्या सिर्फ राजा रानी के मनोरंजन के लिए हैं ? नहीं , ऐसा तो कोई संकेत कविता में नहीं मिलता |

 




“तात ! प्रियंवद ! लो,यह सम्मुख रही तुम्हारे

वज्रकीर्ति की वीणा

यह मैं , यह रानी , भरी सभा यह

सब उदग्र , पर्युत्सुक

जन मात्र प्रतीक्षमाण !”

ध्यान दें कि कविता के आखिर में वह “जनता” है जो कला साधक को धन्य-धन्य कहती है – “जनता विह्वल कह उठी , धन्य ! हे स्वरजित ! धन्य ! धन्य !” | क्या कविता से इस जनता को इसलिए निकाल बाहर किया जाए कि यह कविता अज्ञेय की है | स्मरण करना चाहिए कि वीणा जब झनझना उठती है तो उसके संगीत में किसने क्या सुना –

“इस को वह कृपा वाक्य था प्रभुओं का

उस को आतंक-मुक्ति का आश्वासन !

इस को वह भरी तिजोरी में सोने की खनक

उसे बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुदबुद |

किसी एक को नयी वधू की सहमी सी पायल ध्वनि

किसी दूसरे को शिशु की किलकारी |

एक किसी को जाल-फंसी मछली की तड़पन

एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की |

एक तीसरे को मंडी की ठेलमठेल , गाहकों की आस्पर्धा भरी बोलियाँ

चौथे को मंदिर की ताल युक्त घंटा ध्वनि |

और पांचवें को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें

और छ्ठें को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की

अविराम थपक |

बटिया पर चमरौंधे की रुंधी चाप सातवें के लिए

और आठवें को कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल |

इसे गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की

उसे युद्ध का ढोल” |

संगीत को नाद ब्रह्म कहा गया है | वह जोड़ता है , तोड़ता नहीं | प्रियंवद की संगीत साधना के पश्चात “इयत्ता सबकी अलग अलग जागी / संघीत हुई / पा गई विलय” का तात्पर्य समझना होगा | यह विलय रेखांकित करने योग्य है | एक समूचा लोक जीवंत रूप में यहाँ धड़कता हुआ उपस्थित है | इस प्रसंग को राज सत्ता से जोड़ना उसे सीमित कर देने जैसा होगा | जहां आतंक-मुक्ति का आश्वासन है , जहां बटुली में अन्न की सोंधी खुदबुद है , नयी वधू की सहमी सी पायल ध्वनि , शिशु की किलकारी , जाल-फंसी मछली की तड़पन , मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया , मंडी की ठेलमठेल , मंदिर की घंटा ध्वनि , लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें , लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की अविराम थपक , बटिया पर चमरौंधे की रुंधी चाप , कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल , गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की और युद्ध का ढोल भी है , वहाँ कैसे कह दें कि यह हिंदी कविता का लोक नहीं है |

और जरा प्रियंवद कि साधना को देखें | उसका समर्पण देखें | क्या कहता है प्रियंवद , राजा को – “श्रेय नहीं कुछ मेरा / मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में / वीणा के माध्यम से अपने को मैंने सब कुछ को सौंप दिया था / सुना आपने जो वह मेरा नहीं / न वीणा का था / वह तो सब कुछ की तथता थी / महाशून्य / वह महामौन / अविभाज्य , अनाप्त अद्रवित , अप्रमेय जो शब्दहीन सब में गाता है” | कबीर ने यही तो कहा था – तेरा तुझको सौंपता – नहीं ? अरुण कमल भी तो यही कहते हैं – सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार |

कहने कि आवश्यकता नहीं कि असाध्य वीणा” मनुष्य और प्रकृति के सह-अवस्थान और अपने लोक के प्रति अगाध कृतज्ञता बोध की विलक्षण गाथा है | अपने लोक के प्रति कृतज्ञता-बोध से भरा कवि ही कहा सकता है – “आमि तोमादेर-ई लोक” |

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"कृति ओर" (संपादक - डॉ .रमाकांत शर्मा) के लोकधर्मी काव्यालोचन अंक में प्रकाशित
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नील कमल 
244, बांसद्रोणी प्लेस
(मुक्त धारा नर्सरी- के. जी. स्कूल के निकट)
कोलकाता – 700070.
[मोबाइल नं . (0) 9433123379.]

 

 

 

Saturday, June 22, 2013

बीच बहस में कविता - 22 : आत्मारंजन की कविता "पृथ्वी पर लेटना"

 ख़ालिस संवेदनाओं के कवि आत्मारंजन की कविताओं में अपने समयकाल की निष्कपट छवियां हैं । "पगडंडियां गवाह हैं", आत्मारंजन का हाल ही में प्रकाशित पहला कविता-संग्रह है । संग्रह की कविताएं अपने सरोकारों के चलते किसी भी सहृदय पाठक के मन-मस्तिष्क पर अपना प्रभाव बनाने में सक्षम हैं । सचमुच, यह ठहर कर सोचने का समय है कि आज कविता के सरोकार क्या हैं और इन कविताओं के साथ क्या हैं हमारे सरोकार । बड़ी मासूमियत के साथ कवि कहता है - सुख का क्या है, वह तो मिल जाता है एक छोटे से स्पर्श में भी । यह स्पर्श है मिट्टी का स्पर्श ! कवि सचेत करता है कि मिट्टी में मिलाना और धूल चटाना जैसी उक्तियां विजेताओं के दम्भ से निकली हैं । असल में तो धूल चाटने वाला ही जान पाता है मिट्टी की महक को और धरती के स्वाद को । इतना ही नहीं, कवि की चिन्ता यह भी है कि धरती और मिट्टी के सन्दर्भ में जीतना और जोतना पर्यायवाची हैं और यहां जीतने की शर्त रौंदना नहीं बल्कि रोपना है ।


संग्रह की कविताओं में "पृथ्वी पर लेटना" कविता खास तौर पर समकालीन सन्दर्भों में उल्लेखनीय है । इसके स्पष्ट कारण हैं । सबसे पहले तो यह कविता श्रम और उससे उपजी थकान को सम्पूर्ण अर्थवत्ता के साथ न सिर्फ़ उकेरती है बल्कि उसके सौन्दर्य को भी रेखांकित करती है । आत्मारंजन इसी कविता में एक बहुत मारक बात कह जाते हैं: "कि तमाम ख़ालिस चीज़ों के बीच / सुविधा एक बाधा है" । यह एक छोटी सी काव्य-पंक्ति अपनी अनुगूंजों के लिए अर्थवान है ।

बात कविता की करें तो उसमें थक कर चूर होती हुई एक मानुष-देह का विश्राम है । विश्राम, आज की सभ्यता का नाभिकीय शब्द । यहां श्रम कोई और कर रहा है और विश्राम कोई और ले रहा है । लेकिन श्रम के बिना विश्राम ऐय्याशी में बदल जाता है, वह विलास बन जाता है । भूख के बिना रोटी का स्वाद और प्यास के बिना पानी की तरावट को समझना एक बौद्धिक व्यायाम भर है । उसी तरह श्रम के बिना आराम या विश्राम को समझना एक मानसिक कवायद भर है । आत्मारंजन के सरोकार भी यही हैं । सुविधा एक बाधा है क्योंकि वह व्यक्ति को समझौतों की संकरी गली तक खींच कर ले जाती है । जो भारी थकान से शिथिल होकर धरती पर पीठ के बल लेटा है वह कविता की भाषा में "पृथ्वी से सीधा संवाद कर रहा" है ।

कहना न होगा कि यह कविता एक ऐसे समय और समाज की खोज की यात्रा पर निकलती है जहां प्रकृति और मनुष्य का सह-अस्तित्व अपनी उन्मुक्तता में सम्भव बनता है ।
 

पृथ्वी पर लेटना (कविता):


पृथ्वी पर लेटना

पृथ्वी को भेंटना भी है

ठीक वैसे जैसे

थकी हुई हो देह

पीड़ा से पस्त हो रीढ़ की हड्डी

सुस्ताने की राहत में


गैंती-बेलचे के आसपास ही कहीं

उन्हीं की तरह

निढाल हो लेट जाना

धरती पर पीठ के बल

पूरी मौज में डूबना हो

तो पृथ्वी का ही कोई हिस्सा

बना लेना तकिया

जैसे पत्थर

मुंदी आंखों पर और माथे पर

तीखी धूप के खिलाफ़

धर लेना बांहें

समेट लेना सारी चेतना

सिकुड़ी टांग के खड़े त्रिभुज पर

ठाठ से टिकी दूसरी टांग

आदिम अनाम लय में हिलता

धूल धूसरित पैर

नहीं समझ सकता कोई योगाचार्य

राहत सुकून के इस आसन को

मत छेड़ो उसे ऐसे में

धरती के लाड़ले बेटे का

मां से सीधा संवाद है यह

मां पृथ्वी दुलरा-बतिया रही है


सेंकती सहलाती उसकी

पिराती पीठ

बिछावन दुभाषिया है यहां

मत बात करो

आलीशान गद्दों वाली चारपाई की

देह और धरती के बीच

अड़ी रहती है वह दूरियां ताने

वंचित होता/चूक जाता

स्नेहिल स्पर्श

ख़ालिस दुलार

कि तमाम ख़ालिस चीज़ों के बीच

सुविधा एक बाधा है

पृथ्वी पर लेटना

पृथ्वी को भेंटना भी है

खास कर इस तरह

ज़िन्दा देह के साथ

ज़िन्दा पृथ्वी पर लेटना ।

 

 

 

 

Thursday, April 18, 2013

बीच बहस में कविता- 21: अग्निशेखर की कविता "धूल"


"धूल में मिला देना" हिन्दी में एक मुहावरा है । यह धूल नश्वरता का रूप है तो सृजन का भी है । धूल दिखती नहीं तब भी वह होती है । वह हवा में तैरती है और चीज़ों पर अपनी छाप छोड़ती है । कवि अग्निशेखर जब धूल को देखते हैं तो वह मामूली सी धूल समय में बदल जाती है । इस धूल का वितान बहुत बड़ा हो जाता है । "धूल" कविता में अग्निशेखर एक दार्शनिक की तरह धूल से साक्षात्कार करते हैं ।

 

 कवि अग्निशेखर हिन्दी के उन विरलतम कवियों की प्रजाति से हैं जो सम्मान में गुलदस्ता लेने के लिए सरकार के आगे झुकना स्वीकार नहीं करते उन्हें पढ़ते हुए ज़ेहन में दस्तक देती हुई एक ख़बर दाख़िल होती है कि इस कवि ने "इक्यावन हज़ार रुपए का सम्मान" ठुकरा दिया था चालाक समय में यह "बदतमीज़ी" कितने कवि कर सकते हैं "धूल सने कांच" पर यह यह कवि की "उधेड़बुन" है :

"यह कैसे समय में रह रहे हैं हम / कि धूल सने काँच पर / हमारे संवेदनशील स्पर्श / हमारी उधेड़बुन / हमारे रेखांकन / हमारी बदतमीजियों के अक्स / कहे जाते हैं"


धूल जैसी साधारण दिखने वाली चीज़ कवि के यहां इतनी शातिर है कि ज़िन्दगी के कोनों-अंतरों तक पीछा करती है । वह "सपनों में खिल आए गुलाब" पर भी गिरती है । उसकी पहुंच की ज़द में वह "अलमारी" भी है जिसे हम "सबके सामने नहीं खोलते" । अग्निशेखर के यहां धूल इतनी ज़िद्दी है कि वह "इन शब्दों में" कविता लिख रहे कवि की ओर "कहीं पास से" देख रही है और कवि के "कहीं चले जाने पर" इरादतन लिखने की मेज़ पर "उतर आएगी" । कविता में धूल एक रहस्य से भरे बिम्ब के रूप में प्रकट होती है ।

 

कविता में ज़िन्दगी एक "धुली हुई सुबह" की तरह खुलती है हमारे बीच । कहना न होगा कि इस ज़िन्दगी में  प्रकृति की आदिम पवित्रता  की महक है । यह ज़िन्दगी हमारे बीच ऐसे खुलती है "जैसे कि एक पत्र हो" जो अभी-अभी एक बन्द लिफ़ाफ़े से निकला है और जिसे अभी पढ़ा जाना है । जैसे ही हम किसी "बे-पढ़े वाक्य" को छूना चाहते हैं, वह धूल "हमारी अंगुली से चिपक जाती है" । यह बात कवि को हैरत में डालती है कि यह धूल आख़िर आती कहां से है :

"जब हमें दिखाई नहीं देती /  पता नहीं कहाँ रहती है उस समय" ।

 

कवि धूल के इस तिलिस्म को तोड़ना चाहता है । कविता में ही एक जगह वह कहता है : "यों देखा जाए तो /  जिसे हम काली रात कहते हैं / वह सूरज की आँख में / धूल का झोंका है" । कहने की आवश्यकता नहीं कि "आंखों में धूल झोंकना" भी हिन्दी में एक मुहावरा है । इस तिलिस्मी समय में जो सर्वशक्तिमान है वह हमारी आंखों में धूल झोंकने वाला है, वह हमें धूल में मिला देने के लिए निरन्तर साजिशें करता है । उसकी ख़तरनाक पहुंच से हमारे जीवन का अन्तरंग भी अब नहीं बचा । ऐसे समय में अग्निशेखर की यह कविता उम्मीद(सूरज) के चेहरे से धूल पोंछने का काम करती है ।

 

 

धूल / अग्निशेखर

जब हमें दिखाई नहीं देती
पता नहीं कहाँ रहती है उस समय
और जब हम एक धुली हुई सुबह को
जो खुलती है हमारे बीच
जैसेकि एक पत्र हो
उसके किसी बे-पढ़े वाक्य को छूने पर
हमारी उँगली से चिपक जाती है

यह कैसे समय में रह रहे हैं हम
कि धूल सने काँच पर
हमारे संवेदनशील स्पर्श
हमारी उधेड़बुन
हमारे रेखांकन
हमारी बदतमीजियों के अक्स
कहे जाते हैं

यह समय क्या धूल ही है
जिससे कितना भी बचा जाए
पड़ी हुई मिलती है
उस अलमारी में भी
जिसे हम सबके सामने नहीं खोलते
मैंने सपने में खिल आये गुलाब पर भी
इसे देखा है
यों देखा जाए तो
जिसे हम काली रात कहते हैं
वह सूरज की आँख में
धूल का झोंका है

इन शब्दों में
जबकि मै लिख रहा हूँ कविता
वह झाँक रही होगी कहीं पास से
और मेरे कहीं चले जाने पर
उतर आएगी मेज़ पर.