Wednesday, March 30, 2011

बीच बहस में कविता - 1 : वीरेन डंगवाल की कविता "दुश्चक्र में स्रष्टा"





वीरेन डंगवाल की कविता "दुश्चक्र  में स्रष्टा"

 दुष्चक्र में स्रष्टा कवि वीरेन डंगवाल की वह प्रतिनिधि कविता है जो संयोग से उनके उस प्रतिनिधि संकलन का नाम भी है जिसके लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। इस एक कविता में वीरेन डंगवाल ईश्वर को साधारण आदमी की तरह सम्बोधित करते हुए ऐसी कई मिसालें देते हैं जिन्हें आम तौर पर ईश्वर का चमत्कार मान कर लोग अपने मन को बहला फुसला लेते हैं ।जैसा कि कविता के शीर्षक से ही पता चलता है यह सीधे सीधे ईश्वर पर आरोप करती हुई कविता है ।ईश्वर अर्थात सृष्टि की सबसे ताकतवर सत्ता ।सचराचर जीवन जगत की हर शै में जिस ईश्वर का हाथ बताया जाता है कवि उससे ही टकराता है कविता मे।


कविता के प्रथमार्द्ध में कवि कुछ अजूबों का हवाला देता हुआ ईश्वर की कारीगरी पर मुग्ध होता दिखता जरूर है लेकिन वह अचानक एक असहज प्रश्न के साथ ईश्वर के सामने उपस्थित होता है ।प्रश्न इतना असहज कि ईश्वर भी बगलें झांकने लगे ।अप्रस्तुत ईश्वर के पास कवि के प्रश्न से घबरा कर भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं सूझता ।और फिर भागते हुए ईश्वर को कवि की चेतावनी और बेमिसाल सम्बोधन ! यह सम्बोधन कविता के क्षेत्र में बेमिसाल तो है ही सर्वथा नया भी है ।यह कविता ईश्वर कि स्तुति से शुरू होकर ईश्वर की सत्ता को पछाड़ देने तक की विस्तीर्ण यात्रा है ।कविता की आरम्भिक पन्क्तियां हैं


कमाल है तुम्हारी कारीगरी का भगवान
क्या क्या बना दिया बना दिया क्या से क्या !

 आरम्भ में ही क्या क्या बनाने और क्या से क्या बनाने के भेद में छुपा कविता का गूढ निहितार्थ है ।यह सिर्फ ऊपर वाले तेरा जवाब नहीं वाला वक्तव्य नहीं ।यहां संकेत यह भी है कि तुमने क्या से क्या बना दिया भगवान ।छिपकली के छत पर उलटा सरपट भागने का रहस्य हो कि पहाड़ से नदियों के उद्गम का रहस्य ।हाथी और चींटी के सूंड़ों का भेद हो या कुत्ते की जीभ या पूंछ की बात ।या फिर आदमी के शरीर या दिमाग की जटिल संरचना के संकेत । कवि को इन बातों में कारीगरी या कारनामा जितना कम दिखता है दुश्चक्र और संशय उससे कहीं ज्यादा दिखता है ।ईश्वर की सत्ता को लगभग पटकनी देता हुआ कवि पूछता है कि अगर सृष्टि के सारे कारनामे तुम्हारे ही रहमोकरम से हैं तो फिर ऐसा क्यों है कि पिछले चार पांच सौ सालों में न तो कोई नदी ही निकली और न ही कोई पहाड़ या समुद्र बना ।कहां है तुम्हारा वह कामयाब कारखाना और क्यों है चारों तरफ यह खून खराबा बाढ भूकम्प तूफ़ान हत्याएं अकाल भूख हाहाकार ।आखिर यह सृष्टि कौन चला रहा है ?

 हां एक अन्तहीन सूची है भगवान
तुम्हारे कारनामों की जो बखानी न जाये
जैसा कि कहा ही जाता है ।
यह जरूर समझ में नहीं आता
कि फिर क्यों बन्द कर दिया तुमने
अपना इतना बड़ा कारखाना ?

 और अन्त में तिलमिला देने वाला प्रश्न कि अगर तुम हो तो कहां हो भगवान कि किनके हाथों सौंप दिया है तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार ।ईश्वर के पास भी इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं । वह कहीं जा छुपा है । किसी घोंसले में किसी सातवें आसमान पर ।कवि अपनी उपलब्ध भाषा में सारे विस्मयादिबोधक सम्बोधनों को चुन चुन कर दागता है ईश्वर की
तरफ ।


आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा कारोबार ? अपना कारखाना बन्द करके
किस घोंसले में जा छिपे हो भगवान ? कौन सा है आखिर वह सातवां आसमान ? हे ,अरे ,अबे ओ करुणानिधान !!!

 हे ,अरे ,अबे ओ करुणानिधान !!! "किसी आस्तिक की पुकार नहीं है ।यह कवि विद्यापति का अपने आराध्य के लिये सम्बोधन भी नहीं ।यहां कवि शंकराचार्य के मायावाद को चुनौती भी नहीं दे रहा । कवि इस कविता में समाज के सबसे पिछले पायदान पर खड़े साधारण और कमज़ोर आदमी की ओर से बोलता है ।कविता में भगवान, भगवान नहीं बल्कि सत्ता के सर्वोच्च आसन पर बैठा वह नियन्ता है जो "दुश्चक्र" में शामिल है ।इस मायने में" दुश्चक्र में सृष्टा" कवि वीरेन डंगवाल की "सिगनेचर" कविता है जो ईश्वर के "फाउल प्ले" को बेनक़ाब करती हुई मनुष्य के साथ खड़ी होती है ।इस अर्थ में यह एक बड़ी कविता है ।

  

3 comments:

  1. बेहतरीन पोस्ट। इसे जारी रखें... शुभकामनाएं...

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  2. shukriyuaa neel kamal , ise padhwaane ke liye. main ne is kavitaa kee is se behatar padhat naheen dekhee hai.

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