Monday, April 11, 2011

बीच बहस में कविता-2 :हेमन्त कुकरेती की कविता -"चांद पर नाव"




हेमन्त कुकरेती की कविता -"चांद पर नाव"

  कवि हेमन्त कुकरेती का कविता संग्रह "चांद पर नाव" वर्ष २००३ में छप कर आ गया था । इसी संकलन में शामिल शीर्षक कविता कवि की एक प्रतिनिधि कविता के रूप में देखे जाने की मांग रखती है । यह कविता अपनी भाषा-भंगिमा में विशिष्ट तो है ही यह हमें सोचने के लिये उकसाती भी है । कविता में अर्थों और ध्वनियों की कई परतें हैं । यह समकालीन कविता की भेड़ चाल से बिलकुल अलग कविता है । इसे समझने के लिये सिर्फ़ कविता का एक-दो पाठ ही पर्याप्त नहीं । पाठक को कविता तक पहुंचने के लिये इसके मिजाज़ को जानना बहुत ज़रूरी है । कविता में बिम्ब भले ही बड़े साधारण दिखते हैं पर उनका भाव विस्तार बड़ा सघन और असाधारण है । एक अर्थ में यह यथास्थितिवाद को तोड़ती कविता है ।


 "जुलूस में गये हुए पड़ोसी गला बैठ जाने से
गरारे कर रहे थे
परिवार में दूर के सम्बन्धी के मरने की खबर
रोटी के साथ परोसी गई
स्कूल से भागे हुए बच्चे ज्यादा खाने से परेशान थे
हंस हंस कर पेट दुख रहे थे औरतों के
जो सर्दियों को बुन रही थीं
अपने पतियों के साथ "

 ये कविता पंक्तियां पूरी कविता का मध्य भाग हैं । इनमें उन पड़ोसियों की चर्चा है जो जुलूस में गये हुए थे और जिनका गला बैठ चुका है ( शायद नारे लगा लगा कर ) । वे गले को राहत देने और बैठी हुई आवाज़ को पुन: अर्जित करने के लिये गरारे कर रहे हैं । वह कैसा जुलूस होगा ? वह जुलूस किसी के विरोध में भी हो सकता है और समर्थन में भी । दोनों ही स्थितियां गला फाड़ कर चिल्लाने का अवसर देती हैं । कविता यहां दोनों छोर पर खुली हुई है और पाठक को स्वतन्त्र चिन्तन का अवसर देती है ।


लेकिन यहां एक पड़ोसी ऐसा भी है जो दूर के सम्बन्धी का मृत्यु संवाद भी भोजन के साथ निगल सकता है । यह उदासीनता की परकाष्ठा रचता हुआ बिम्ब है । कविता में स्कूल से भागे हुए बच्चे भी हैं । ये बच्चे परेशान हैं पर इनकी परेशानी की वजह विस्मय पैदा करती है । कविता में कुछ हंसती हुई औरतें हैं । ये औरतें सर्दियों को बुन रही है । यह कवि का अर्जित किया हुआ मुहावरा है । खुद गढ़ा और तराशा हुआ । यह परिदृश्य कुल मिला कर एक ठंडी तटस्थता, उदासीनता और यथास्थितिवाद की ओर संकेत है । यह एक भयावह दुनिया है जहां सहभागिता और सह अस्तित्व के लिए कोई जगह नहीं । कहीं कोई हलचल नहीं ।


 " सूरज समय पर निकलता था रात समय पर होती थी 
राजधानी में सूखे का डर नहीं था
सरकारी घोषणाएं डरी हुई थीं मित्र देश के गृह युद्ध से
बच्चे जन्म ले रहे थे बूढ़ों की उम्र बढ़ रही थी "

 कवि एक ऐसे जीवन जगत की ओर उंगली उठा रहा है जहां सब कुछ यन्त्रवत चल रहा है । इस यन्त्र चालित सामाजिकता में भी राजधानी "सूखे के भय" से मुक्त है । जाहिर है सूखे की पहुंच राजधानी तक नहीं है । इस सामाजिकता में "सरकार" की चिन्ता का विषय सूखा नहीं है बल्कि पड़ोसी देश का गृह युद्ध है । इस यन्त्रवत जीवन यापन और इस तटस्थ सामाजिकता का भविष्य क्या हो सकता है यह कवि की चिन्ता भी है और उसका सरोकार भी । कवि की यही चिन्ता कविता की आरम्भिक पंक्तियों में अपने पाठक को सम्बोधित है ।


 "आओ चांद पर नाव चलाते हैं
उसने गम्भीर हो कर कहा
आस पास हत्यारे थे उनके हत्या करने के विचार
इन दिनों छुट्टियां मनाने परिवार सहित गांव गए थे "

 साधारण बोध बुद्धि रखने वाला पाठक भी जानता है कि चांद पर पानी तो क्या इसके चिन्ह तक नदारद हैं । ऐसे में कविता में "चांद पर नाव" चलाने की बात ! कौन है वह ? कौन चलाना चाहता है चांद पर नाव ?? कविता में अदृश्य वह सार्वनामिक विशेषण कोई व्यक्ति भी हो सकता है और कोई सत्ता भी । वह अपनी बात पूरी गम्भीरता के साथ रख रहा है । स्मरण रहे कि यह दिल्लगी में कही गई बात नहीं है । यह सार्वनामिक विशेषण ही कविता का "अर्थात" है । "वह" हत्यारों से घिरा है और हत्यारों के मूल विचार सपरिवार छुट्टियां मनाने किसी गांव गए हुए हैं । यह मोटी जानकारी तो कविता में ही दर्ज है । प्रश्न यह है कि हत्या के विचार का परिवार कैसा हो सकता है ? कविता में प्रश्न तो है उत्तर नहीं है । उत्तर कविता के बाहर कहीं है । कविता में कल्पना के लिये पर्याप्त स्पेस है । पाठक के लिए हैरानी की बात यह भी है कि हत्यारे और उनके विचार आखिर गांव में क्या कर रहे हैं । इसका एक समाधान यह हो सकता है कि जिनका स्थायी पता राजधानी है वे गांवों में अवकाश पर हैं । जो जहां है उसे वहां नही होना था ।


  " समाज में जो जहां था उसे वहां नहीं होना चाहिए था
आस पास रेत थी नाव नहीं थी कहीं
चांद इमारतों के पीछे छटपटा रहा था "

 कल्पना से इतर जो यथार्थ है उसमें पानी की जगह रेत है । चांद जिसे आसमान में खिलना था वह इमारतों के पीछे छटपटाता हुआ पड़ा है ।ऐसे में चांद पर नाव चलाने की बात जो कह रहा है उससे ऐसा गम्भीरता से कहलवाने में कुछ लोगों की निश्चित भूमिका है । कवि का स्पष्ट संकेत है कि जो जहां है उसे वहां नहीं होना चाहिए था । चांद पर नाव चलाना एक असम्भव स्वर्गीय विलासिता की कल्पना है । जिन्हें ऐसे जीवन की लालसा है उन्हें कवि चिन्हित करना चाहता है और उनकी वास्तविक जगह भी तय करना चाहता है । कुछ कुछ मुक्तिबोध की तरह कि "जो है उससे बेहतर चाहिए / समाज को साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए" । लेकिन मेहतरी करने के लिए आखिर कौन तैयार है ?

  "उसने मज़ाक में नहीं कहा था कि
चांद पर नाव चलाते हैं
यह बात उससे गम्भीरता से कहलवाने में
किसकी भूमिका थी ?"
 यह कविता इसी प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ती कविता है जिसमें कहे से ज्यादा अनकहे की आवाज़ गूंजती है  

1 comment:

  1. बढ़िया...यह कविता पहले नहीं पढ़ी थी... लेकिन आपने बहुत अच्छे से लिखा है... बधाई...

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