Saturday, April 23, 2011

बीच बहस में कविता - 3 : सुरेश सेन निशान्त की कविता - "पिता का गमछा"




सुरेश सेन निशान्त की कविता - "पिता का गमछा"  

   "सूख रहा है अलगनी पर पिता का गमछा 
  कितनी ही पीड़ा भरी यात्राओं का गवाह .."

 समकालीन हिन्दी कविता में जिन थोड़े से कवियों में जनपदीय चेतना प्रमुखता से पाई जाती है उनमें सुरेश सेन निशान्त का नाम अन्यतम है । इनकी कविताओं में स्थानीयता-बोध के साथ-साथ जो चीज़ सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है वह है "श्रम का सौन्दर्य" "पिता का गमछा" एक ऐसी ही कविता है जिसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए । वैसे तो "पिता" हिन्दी कविता के लिए कोई नया काव्य-विषय नहीं है लेकिन इस विषय के साथ कवि के सुलूक में एक "तटस्थ विवेक" और "साधारण में असाधारणता की खोज" ज़रूर कुछ नई बात है । "पिता" इधर की कविता में एक रोमान्टिक विषय रहा है । मुझे कवि एकान्त श्रीवास्तव की एक कविता इस सन्दर्भ में याद आती है - "जिनके पिता नहीं होते / खुद अपने पिता होते हैं ऐसे बच्चे" । ऐसी और भी बहुत सी कविताएं हैं । ज्यादातर कवियों में इस विषय को लेकर एक रूमानियत सी है । विचारणीय है कि "पिता का गमछा" कविता के केन्द्र में गमछा है, न कि पिता । यहां पिता की प्रासंगिकता बस इतनी है कि वह गमछा पिता का है । इसी वजह से मैंने "तटस्थ विवेक" की बात ऊपर उठाई । ऐसा मालूम होता है कि कविता की अदालत में पिता को कठघरे में खड़ा कर दिया गया हो और किसी मुकद्दमे की सुनवाई में गमछा गवाह की भूमिका में खड़ा हो । कविता की आरम्भिक पन्क्तियों में ही अलगनी पर सूखता हुआ गमछा पिता की पीड़ा भरी यात्राओं की गवाही देता हुआ मिलता है । तो जाहिर है कि मामला पिता की पीड़ा भरी यात्राऒं का है जिस पर निर्णायक फ़ैसला स्वयं कवि को देना है ।


 "संग पिता के कितनी ही 
 नदियों के जल में नहाया
 इसके रंग उड़े धागों में समाये हैं
 पिता के पसीने से भींगे
 अनेक खट्टे-मीठे अनुभव
 कांधे की न मिटने वाली थकान
 जितनी मर्ज़ी धो लो इसे
 नहीं उड़ती इसमें रची-बसी
 पसीने और तम्बाकू की पिता-सी गंध.." 

 पीड़ा भरी यात्राओं का गवाह वह गमछा पिता के सुख-दु:ख का साथी है । अन्तिम सांस तक साथ न छोड़ने वाला वफ़ादार दोस्त है । इसके धागों का रेशा-रेशा अपनी रंगत भले ही खो चुका हो लेकिन इसमें कुछ ऐसा है जो अनमोल है - हाट बाजार में बिकने वाली वस्तुओं से बहुत अलग । वह अनमोल चीज़ है पिता के पसीने से भींगे खट्टे-मीठे अनुभव और पिता के कंधे की अमिट थकान । इसके रेशों में पिता की देह-गंध है । पसीने और तम्बाकू जैसी । "पिता" जैसी पिता की देह-गंध - किसी दूसरे गंध से जिसकी तुलना नहीं की जा सकती । कविता में शब्दों के प्रयोग पर ध्यान दें - "पसीने और तम्बाकू की पिता-सी गंध" (पसीने और तम्बाकू - सी पिता की गंध नहीं) । गमछे के धागों में रची बसी पसीने और तम्बाकू की गंध पिता- जैसी है । अर्थात पिता की याद दिलाने वाली गंध । वह पिता की देह-गंध है जो पसीने और तम्बाकू की गंध के साथ एकमेक होकर गमछे के रेशॊं में चस्पां है । पिता की देह-गंध कभी न उड़ने वाली गंध है । जब तक गमछा है तब तक पिता की देह-गंध भी है । गंध में पिता की उपस्थिति !

 यह महज कल्पना की महीन कात नहीं है बल्कि वैग्यानिक तथ्य भी है कि मनुष्य की देह से नि:सृत एक विशेष प्रकार का रासायनिक द्रव्य (फ़ेरोमोन) उसके अंगूठे के छाप जितना ही विशिष्ट पहचान वाला होता है । कविता में गमछा अदृश्य पिता की उपस्थिति का आभास देता है ।


  " इसके धागों में हैं बुनकरों के रतजगे 
  उनके हाथों का हुनर
  जो पोंछता है पिता की थकी पीठ
  देता रहता है दिलासा उदास पिता को
  लाते रहते हैं सौदा-सुलफ़
  इसी में बांध कर पिता.." 

 अलगनी पर सूखता वह बदरंग गमछा अपने में पिता को ही समेटे रहता तो और बात थी , यहां तो उसमें बुनकरों के रतजगे भी जुड़ जाते हैं और उनके हाथों का हुनर भी । कवि, पिता को याद करते हुए उन हाथों को नहीं भूलता जिन्होंने इनके महीन धागों को बुना होगा- कई रातें आंखों में काटते हुए। कविता के ताने-बाने में व्यक्ति अपने समाज से जुड़ता है और ऐसा करते हुए उसका हृदय कृतग्यता- बोध से भरा रहता है । कबीर की बानी - "झीनी-झीनी बीनी चदरिया" याद आती है । वह उन बुनकरों का हाथ है जो पिता की थकी पीठ को पोंछता है और उदासी में पिता को दिलासा भी देता है । इसे कहते हैं "श्रम का सौन्दर्य" ! कविता में सुरेश सेन निशान्त इसे अनायास ही साधते दिखते हैं । गमछा में सौदा-सुलफ़ बांध कर पिता लाते तो ज़रूर हैं लेकिन यहां कहीं न कहीं उन श्रमिकों के हाथ भी होते हैं जिन्होंने कई रतजगों के बाद इस गमछे को बुना होगा । कविता में और आगे चल कर वह गमछा जीवन-मूल्यों से भी जुड़ता है ।


  "अनेक बार सबकी नज़रें बचा कर
  पोंछे हैं आंसू
  इसी को फ़ैला कर मांगी इज्ज़त की भीख
  इज्ज़त जो पिता की मेहनत में रही
  नहीं मिली जो ज़िन्दगी भर मेहनती पिता को
  हर वक़्त मौसम में
  पिता के कंधे पर रहा यह गमछा
  इसके बिना नहीं निकले
  काम पर कभी पिता ।

 जीवन की कठिन लड़ाइयों में जय है तो पराजय भी है । पराजय के क्षण मनुष्य को कमज़ोर बना देते हैं । ऐसे क्षणों में आंसू पोंछने के लिए एक बार फ़िर आ खड़ा होता है पिता  का वह गमछा - पिता के ही आंसू पोंछता हुआ । उसी गमछे को फ़ैला कर मांगी जाती है इज्ज़त की भीख । इज्ज़त श्रम में है -यह कविता की आकांक्षा है । लेकिन यह इज्ज़त पिता को कभी नहीं मिली- यह कविता का यथार्थ है। फ़िर भी यह गमछा- जो पिता के लिए इज्ज़त का प्रतीक बन चुका है - कंधे पर ही रहता है । अपनी प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए श्रम -शक्ति को अभी कितनी लड़ाइयां लड़नी होंगी ।

2 comments:

  1. बेहतर पड़ताल...महत्‍वपूर्ण व उपयोगी पोस्‍ट ।

    ReplyDelete
  2. अच्छा पोस्ट। एक सुझाव कि जिस कविता की पड़ताल हो वह कविता भी साथ में दी जाए पूरी तो कैसा रहे?? इसपर सोचिएगा... फिलहाल मरी बहुत-बहुत बधाईयां... आभार..

    ReplyDelete