Monday, December 12, 2011

बीच बहस में कविता - 9 : उदय प्रकाश की कविता "तिब्बत"






"तिब्बत" कविता के लिए कवि उदय प्रकाश को वर्ष १९८० का "भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार" प्रदान किया गया था । कविता में एक बच्चे की ओर से कवि सवाल करता है - यह बच्चा अपने पिता से सवाल करता है, अर्थात अपने अभिभावक से । प्रश्न कई हैं - गेंदे के एक फूल में कितने फूल होते हैं ? तिब्बत में बरसात जब होती है तब हम किस मौसम में होते हैं ? तिब्बत में जब तीन जब तीन बजते हैं तब हम किस समय में होते हैं ? क्या तिब्बत में गेंदे के फूल होते हैं ? क्या लामा शंख बजाते हैं ? क्या लामाओं को कम्बल ओढ़ कर अँधेरे में तेज तेज चलते हुए देखा है ? क्या लामा हमारी तरह ही रोते हैं ? सवाल ही सवाल हैं कविता में । ये सभी शिशु-सुलभ जिग्यासाएँ हैं । बहुत ही मासूम लेकिन जिनका जवाब उतना ही जटिल । जिस तरह गेंदे का फूल वास्तव में फूलों का समुच्चय होता है उसी तरह यह पूरी कविता भी वास्तव में सवालों का समुच्चय है । कविता का जो निहितार्थ है वह इन सवालों के स्पेस में है । तिब्बती अपने मृतकों के चारों ओर खड़े होकर मन्त्र नहीं पढ़ते बल्कि तिब्बत-तिब्बत बुदबुदाते हैं । उनके खच्चर बगीचों में उतरते जरूर हैं लेकिन वे गेंदे के फूलों को नहीं चरते । कवि उदय प्रकाश की चिन्ता का केन्द्रीय भाव विस्थापित की पीड़ा है । तिब्बती बेघर और बेवतन हैं । वे अपने साथ साथ अपना घर और वतन भी अपने कंधों पर ढोते हैं । वे दूसरे लोगों की ही तरह सभी नागरिक अधिकारों के उतने ही अधिकारी हैं । पर वे वंचित और उपेक्षित जीवन जीते हैं । कविता की आरंभिक पंक्ति में लामा को मन्त्र बुदबुदाते देखा जा सकता है जो कि कविता के आखिर तक आते-आते तिब्बत-तिब्बत की फ़ुसफ़ुसाहट में बदल चुका होता है , अन्तत: रुलाई में विन्यसित होता हुआ । क्या इस पीड़ा को शब्दों में बाँधना सम्भव है ? जड़ों से उखड़े हुए इन्सानों की पीड़ा बड़ी गहरी हुआ करती है ।


तिब्बत
(उदय प्रकाश की एक कविता)

तिब्बत से आये हुए
लामा घूमते रहते हैं
आजकल मंत्र बुदबुदाते
उनके खच्चरों के झुंड  
बगीचों में उतरते हैं
गेंदे के पौधों को नहीं चरते
गेंदे के एक फूल में
कितने फूल होते हैं पापा 

तिब्बत में बरसात जब होती है
तब हम किस मौसम में होते हैं ? 
तिब्बत में जब तीन बजते हैं
तब हम किस समय में होते हैं ? 
तिब्बत में गेंदे के फूल होते हैं क्या पापा  ? 

लामा शंख बजाते है पापा
पापा लामाओं को कंबल ओढ़ कर
अंधेरे में तेज़-तेज़
चलते हुए देखा है कभी
जब लोग मर जाते हैं तब
उनकी कब्रों के चारों ओर
सिर झुका कर
खड़े हो जाते हैं लामा
वे मंत्र नहीं पढ़ते ।

वे फुसफुसाते हैं
तिब्बत तिब्बत
तिब्बत - तिब्बत 
तिब्बत - तिब्बत - तिब्बत
तिब्बत-तिब्बत तिब्बत
तिब्बत-तिब्बत तिब्बत 
और रोते रहते हैं रात-रात भर
क्या लामा हमारी तरह ही रोते हैं पापा  ? 

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