Saturday, February 11, 2012

बीच बहस में कविता -12 : बोधिसत्व की कविता "मैं कोई उपदेशक तो हूँ नहीं"



हाल ही में बोधिसत्व की एक कविता "मैं कोई उपदेशक तो हूँ नहीं" पढ़ते हुए यह बात मन में बार बार उठती रही कि हर महत्वपूर्ण कविता अपने समय की आलोचना भी तो है । समय सिर्फ़ घड़ी के काँटे में और कैलेण्डर के पन्नों में ही दर्ज नहीं हुआ करता है । वह रचना में भी चाहे अनचाहे बखूबी अपने आप को रखता चलता है - ताकि सनद रहे और वक्त ज़रूरत पर काम आये । कहने की ज़रूरत नहीं रह जाती कि इस कविता को मैं अपने समय पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के तौर पर देखता हूँ ।
 


कविता की आरम्भिक पंक्तियों पर गौर करें तो आप पायेंगे कि एक ज़बरदस्त विरोधाभासी चित्र सामने है - देखो कितना पानी बरस रहा है / सूखा है पूरी तरह आसमान / सूखे आसमान पर वह अंधेरे की तरह छा जाना चाहता है । एक जानी पहचानी हकीकत यह है कि इस समय में जबकि प्रेम और विश्वास का हमारे जीवन में तेज़ी से क्षरण हुआ है , लगातार प्रेम पर कवितायें लिखी जा रही हैं और थोक में लिखी जा रही हैं । इन कविताओं में जीवन के उत्ताप की जगह कोरा भावोच्छ्वास ज़्यादा होता है । लेकिन दिलचस्प यह भी है कि ऐसी कविताओं के प्रसंशक (जो सजग आलोचक कम , काठ की तलवार थामे साहित्य के स्वघोषित सिपहसालार ज्यादा होते हैं) इन क्षणभंगुर कविताओं को कालजयी साबित करने की कवायद में कोई कसर बाक़ी नहीं रहने देते । कविता के यही सिपहसालार ऐसे नक्कालों की जयजयकार करते रहते हैं जो कविता में तो क्रान्ति क्रान्ति चिल्लाते हैं लेकिन स्वयं एक सामाजिक इकाई के रूप में लोभ-लाभ के वे सारे हथकण्डे आजमाते हैं जिनका वे अपने लेखन में विरोध कर रहे होते हैं । बोधिसत्व अपनी इस कविता में इसी विरोधाभास पर प्रहार करते हैं ।
 


कवि अपनी कविता में वैसा ही दिखे जैसा वह अपने जीवन में होता है तो उसकी विश्वसनीयता बढ़ती है और वह अपने पाठक के बीच अधिक ग्राह्य हो जाता है । काले और सफ़ेद का फ़रेबी तालमेल कविता को सन्दिग्ध बनाता है । चर्चित कविता की अगली पंक्तियाँ देखें - मुझे काला रंग पसंद है / अगर वह मन में हो / मुझे उजला रंग पसंद है / अगर वह सिर्फ कपड़ों और दीवारों तक ही चढ़ा हो । कवि खुद से भी प्रश्न करता है । उसे बखूबी मालूम है कि कविता ही उसका सामर्थ्य और उसकी सीमा दोनों तय करती है । क्या ये कवितायें हमें बचायेंगी । कवि इन्हीं कविताओं का हाथ थामे इतना आगे तक निकल आया है कि वह चाहे भी तो पीछे लौट नहीं सकता । लेकिन क्या कविता का रास्ता कहीं पहुँचने के लिये होता है । यह रास्ता तो बस चलते रहने की शर्त पर ही शुरू किया जा सकता है । इस रास्ते पर चलना भी एक सुख और सन्तोष का अनुभव देता है । जिन्हें कहीं पहुँचना है वे शायद इस रास्ते के लिए बने ही नहीं । यह जीवन का कठिन रास्ता है । यह वो डगर है जिसे भारतीय मनीषियों ने "काल" कहा है । इस रास्ते पर ठोकरें ज़्यादा हैं सुगमता बहुत कम है । यहाँ संघर्षों की आँच है , घात-प्रतिघात है , भ्रम है , मिथ्या प्रलोभन है । ऐसे में अपनी भूमिका को तय कर लेना ज़रूरी बन पड़ता है । बोधिसत्व इसी कविता में एक स्थान पर कहते है - जरूरी नहीं कि चोट पड़ने पर भी शांत बना रहूँ / जब पीटे जाने पर बोल उठती है ढोल तो मैं / तो अभी थोड़ा बहुत जीवित हूँ / सुनो सब कुछ स्वीकार करना / किंतु हिंसक मित्रता कभी करना स्वीकार ।
 


क्या है यह हिंसक मित्रता ? कवि ऐसी मित्रता की अपेक्षा एक शव का साथ अधिक काम का बताता है तो यह अकारण नहीं । स्वांग , जोड़-तोड़ और दाँव-पेंच आज की हिन्दी कविता के चरित्रगत वैशिष्ट्य हैं । न जाने हिन्दी कविता को अभी कितने राजा बली और कितने ही वामन अवतार देखने हैं । अपनी इसी कविता में बोधिसत्व लिखते हैं - खोट कपट से अर्जित सुख क्या सदा रहेगा / छीन-झपट से निर्मित सुख क्या सदा रहेगा । यह लाजमी है कि कविता अपने शत्रु पक्ष की पहचान भी करती रहे । हर समय में सच और झूठ एक साथ चलते हुए आपस में टकराते हैं । इस टकराव से बच निकलना चालाकी है जो आज की कविता में अनायास ही देखी जा सकती है । कविता में चालाक लोग रात की कालिमा की तरह छा जाने का हुनर जानते हैं । इन्हें चिन्हित कर के और इनसे टकरा कर ही कविता अपना वैभव पा सकती है । ऐसे में इन पंक्तियों को बार बार देखे और पढ़े जाने की आवश्यकता है - देखो रात सघन है आई / देखो वह रात के अंधेरे की तरह सर्वत्र विराजने के लिए / औंधे मुख फोड़े की तरह संचित कर रहा है मवाद / और इससे अधिक मैं क्या कहूँ / मैं कोई उपदेशक तो हूँ नहीं ।
 


मैं कोई उपदेशक तो हूँ नहीं
(बोधिसत्व)


देखो कितना पानी बरस रहा है
सूखा है पूरी तरह आसमान
सूखे आसमान पर वह अंधेरे की तरह छा जाना चाहता है


मुझे काला रंग पसंद है
अगर वह मन में हो
मुझे उजला रंग पसंद है
अगर वह सिर्फ कपड़ों और दीवारों तक ही चढ़ा हो।


क्या मेरी कविता मुझे बचाएगी
क्या तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी
तुम्हारे साथ इतना दूर चला आया हूँ
और इतने रास्ते पार कर चुका हूँ कि अब तो सही रास्ता भी नहीं पकड़ पाऊँगा।


जरूरी नहीं कि घर लौटू जरूरी नहीं कि कहीं पहुँच ही जाऊँ
जरूरी नहीं कि चोट पड़ने पर भी शांत बना रहूँ
जब पीटे जाने पर बोल उठती है ढोल तो मैं तो अभी थोड़ा बहुत जीवित हूँ।


सुनो सब कुछ स्वीकार करना
किंतु हिंसक मित्रता कभी करना स्वीकार
एक शव दे सकता है साथ किंतु


मैं उपदेशक नहीं
किंतु कहता हूँ
खोट कपट से अर्जित सुख क्या सदा रहेगा
छीन-झपट से निर्मित सुख क्या सदा रहेगा।

देखो रात सघन है आई
देखो वह रात के अंधेरे की तरह सर्वत्र विराजने के लिए
औंधे मुख फोड़े की तरह संचित कर रहा है मवाद
और इससे अधिक मैं क्या कहूँ
मैं कोई उपदेशक तो हूँ नहीं।


(
फ़ेसबुक पर ०७.०२.२०१२ को प्रकाशित कविता)

5 comments:

  1. यह कविता जब पढ़ी तो जो बिंब उभरे वे विचलित कर देने वाले थे। नील कमल ने कविता के निहितार्थों को बड़ी गंभीरता और सजगता से खोलने का प्रयास किया है। यह कविता वर्तमान हिन्दी साहित्य के सच और आगे बढ़कर उसके अंतर्विरोध पर उंगली रखती है। वे कौन हैं जो आसमान पर अंधेरे की तरह छा जाना चाहते हैं, वे कौन हैं जिनकी मित्रता एक समय हिंसक मित्रता में तब्दील हो जाती है, वे कौन हैं जो सर्वत्र विराजने के लिए औंधे मुंह फोड़े की तरह संचित कर रहे हैं मवाद? कविता इसलिए महत्वपूर्ण हो गई है इन तमाम प्रश्नों के बहाने वह कई नंगे सच से भी पाठकों को रूबरू कराती है और ये सारे प्रश्न उठाती कविता इनके उत्तर भी प्रस्तुत करती चलती है। कवि के रूप में बोधिसत्व ने एक लंबा सफर तय किया है, लेकिन सफर के इस पड़ाव पर कवि को यह क्यों कहना पड़ रहा है कि क्या कविता उसे बचा पाएगी? इस प्रश्न के तुरंत बाद कवि का उत्तर भी है कि कहीं पहुंचने, किसी महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर वह कविता की दुनिया में नहीं आया, वरन वह जीवित रहने तक अपनी बात कहना चाहता है, वही कहना चाहता है जिसे वाकई उसे कहना है और इस निर्मम समय में जिसे कहने की जरूरत है, जिसे कहा जाना लगभग बंद कर दिये जाने के कगार पर खड़ा है। बोधिसत्व खुद के साथ कवि और कविता को भी सजग कर रहे हैं। जाहिर है यह कोई उपदेश नहीं है, क्योंकि कविता लिखने वाला उपदेशक-आलोचक नहीं है ( जिसकी ओर भाई नील कमल ने इशारा किया है), वह एक कवि है, एक जिंदा कवि है, उसे भी गुस्सा आता है, उसे भी चोट लगती है, साहित्य के इस समय और समय के इस साहित्य को देखकर उसके मन में भी व्यथा जगती है। जब निर्जीव ढोल पीटे जाने पर बोल उठती है तो यह तो जीवित कवि है। इसलिए कवि अपने ढंग, अपनी शैली में बोल रहा है। और ऐसे सच बोल रहा है जिसपर ध्यान देने की जरूरत है। फिलहाल इतना ही। भाई नील कमल और बोधिसत्व दा को बधाई...

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    1. अपनी कविता पर सुनना पढ़ना अच्छा लगता है, लेकिन बोलना और लिखना कठिन और तकलीफ देह। नीलकमल और विमलेश आप दोनों का आभाऱ।

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  2. बेहतर कवि है बोधिसत्व.

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  3. आत्मावलोकन करने एवं आत्म-शक्ति को पहचानने की कविता … बोधिसत्व की बेहद अच्छी लगी एक कविता …

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  4. आत्मावलोकन करने एवं आत्म-शक्ति को पहचानने की कविता … बोधिसत्व की बेहद अच्छी लगी एक कविता …

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