Saturday, February 25, 2012

बीच बहस में कविता - 13 : निरंजन श्रोत्रिय की कविता "जुगलबंदी"




निरंजन श्रोत्रिय की लम्बी कविता "जुगलबंदी" एक लम्बा इनकार है इतिहास में दर्ज एक हादसे से जिसे गोधरा के नाम से जाना जाता है । इस अर्थ में यह कविता अपने विषय चयन के मामले में एक दुस्साहसिक कदम तो है ही यह अपने पाठ में एक अतिरिक्त सतर्कता की माँग भी रखती है । कविता अपने प्रारूप में खण्ड-काव्यात्मक आख्यानपरकता में रची गई है ।
 

कवि प्रकारान्तर से एक ऐसी कथा का सूत्रधार भी है जो पाठक को वह सब भी बताना चाहता है जो समय की आँख से ओझल रह गया है । कह सकते हैं कि यह कविता के रास्ते समय के इतिहास का पुनर्लेखन भी है । बड़ा प्रश्न यहाँ यह है कि कविता अपने इस प्रयास में कितनी सफ़ल या कि असफ़ल रही है । पाठक के लिए कविता के आरम्भ में सूचना है कि यह कविता पंडित शिवकुमार शर्मा और उस्ताद शफ़ात अहमद खान की संतूर और तबले पर जुगलबंदी से प्रेरित है ।
 

कवि अपने पाठक को विश्वास में लेते हुए कहता है कि दरअसल घटना के दिन सावरमती एक्स्प्रेस के एस-६ कोच में इन उस्तादों की एक जुगलबन्दी हुई थी और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था जैसा जाँच समितियाँ बताती रही हैं । यह जुगलबन्दी एक बड़ा प्रतीक बन जाता है जब कविता में उसे बड़े आयामों से जोड़ दिया जाता है ।
 

शायद कवि की मंशा यह स्थापित करने की रही हो कि यह तो हो ही नहीं सकता । जहाँ अलगू चौधरी और जुम्मन शेख का प्रगाढ़ आलिंगन है , जहाँ बादशाह अकबर से लेकर शाहरुख खान तक की लम्बी जुगलबंदी का इतिहास है वहाँ साम्प्रदायिक दंगे की आग भला कैसे जल सकती है । कवि यकीन दिलाता है कि वह सब झूठ था । सच वह है जो खेतों-कारखानों में पसीना बहाते , पत्थर तोड़ते - मकान बनाते , क्रिकेट और हॉकी खेलते या विवाह के मंत्रोच्चार के बीच शहनाई बजाते उस्ताद बिस्मिल्ला खान की जुगलबंदी से निकलता है ।
 

जुगलबंदी का जो विषद वर्णन है उसमें कई जगहों पर कविता अपने उत्कर्ष पर है । कविता का असल ताना बाना भी इन्हीं जगहों से बनता है । जैसे कि यह कहना कि पंडित शिवकुमार शर्मा के घुंघराए बाल किसी छेड़े गये राग की संगत थी - जैसे कि यह कहना कि जुगलबंदी नहीं यह प्रार्थना थी दरअसल , कि लहलहा उठें मुरझाई फसलें , बहने लगें झरने सदियों से सूखे - जैसे यह कहना कि बीडीयां बुझ चुकी थीं कब की , सूख चुकी थीं पूडियां हाथों में ही , दुबक गई थी अचार की गंध एक कोने में , मांएं भूलीं ढांपना उघड़े स्तन अपने । कविता में ये चित्र जुगलबंदी के लिए एक अलौकिक वातावरण का निर्माण करते हैं ।
 

हाँ कविता में दो जगहें ऐसी जरूर हैं जहाँ बार बार रुक कर उन पर विचार करने की जरूरत महसूस होती है - एक वह जहाँ अचानक दोनों उस्तादों की "कूट भाषा से भरी हुई आंखें" टकराती हैं - और दूसरी जगह वह जहाँ कवि ने उस्तदों के वाद्य के लिए "हथियार" शब्द का प्रयोग किया है ( उतर गये दोनों योद्धा साथी गलबहियां करते / पंडित शिवकुमार शर्मा और उस्ताद शफ़ात अहमद खान / अपने हथियारों समेत / चीर कर भीड़ को करते हुए गर्जना ) । इस जुगलबंदी के बाद उस्तदों की गर्जना क्या है ? वे कहते हैं "नासमझों ! यह जुगलबंदी का देश है !!" यही वह नोट है जिसपर कविता किसी भारी चीज की तरह ठहरी हुई है । देखा जाए तो जो कविता का जो मूल स्वर है वह कविता की आकांक्षा ही अधिक है , तथ्य रूप में इसकी स्वीकार्यता पाठक की अपनी समझ पर और समय की गवाही पर टिकी है ।
 

और अन्त में यह कहना ही होगा कि जुगलबंदी को अधिकाधिक विश्वसनीय बनाने के लिए कवि ने जिन स्वर-लिपियों का सहारा लिया है वे कविता के आम पाठक के उतने काम की नहीं हैं । कविता आवश्यकता से अधिक फ़ैली हुई है जिसे संगीत की जुबान में कहें तो और कसा जा सकता था । बहरहाल कविता एक कठिन समय में जरूरी हस्तक्षेप तो करती ही है ।
  

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