Sunday, April 15, 2012

बीच बहस में कविता - 14 - विमलचन्द्र पाण्डेय की कविता : "हैरानी जीने के लिए एक ज़रूरी चीज़ है"



कविता महज शब्दों का खेल नहीं है । इधर की हिन्दी कविता में एक किस्म की जड़ता इस मामले में उल्लेखनीय रही है कि उसमें जीवन को उसकी सहजता में व्यक्त करने वाले कवि उतने दृश्यमान नहीं रहे जितने कि शब्दों के बाजीगर परिदृश्य में छाए रहे । युवा कवि-कथाकार विमलचन्द्र पाण्डेय पिछले दिनों अपनी उपस्थिति से पाठकों को प्रभावित करते रहे हैं और उनके साथ आश्वस्ति दिलाने वाली बात यह है कि वे कविता में इस बाजीगरी को अपना हथियार नहीं बनाते ।
 
कविता में भरोसा , मासूमियत , हैरानी , प्यार के साथ-साथ जीवन की सहज अवस्था को बचाने की ज़िद के साथ खड़ा कवि अपने पाठक स्वत: अर्जित करता है । ये महज कुछ शब्द नहीं हैं । ये वो जीवन मूल्य हैं जो शब्दों में अपना वैभव खो चुके हैं । कवि विमलचन्द्र पाण्डेय मुझे एक ऐसे कवि नज़र आते हैं जो इन शब्दों को उनका वैभव लौटा देना चाहता है ।
 
कवि बार-बार ठगे जाने पर भी भरोसा करना चाहता है , बार-बार प्यार करना चाहता है । उसे भरोसा करने की बीमारी है । बीमारी इसलिए कि यही गुण उसे दूसरों से पृथक करता है । यह एक "डेविएशन" की तरह है । एक ऐसे समय में जब मासूमियत को बेवकूफ़ी माना जाता हो इस भरोसेपन को बीमारी नहीं तो और क्या कहेंगे । लेकिन दूसरों के लिए जो बीमारी है वह कवि के लिए गर्व का विषय है । मुक्तिबोध ने कई बार "गरवीली गरीबी" जैसे मुहावरे का इस्तेमाल कविता में किया है । यह बीमारी भी उसी अर्थ में गरवीली बीमारी ठहरी । जब गरीब को अपनी गरीबी पर गर्वबोध होने लगे तो उसके कद को मापने के लिए फ़ीते छोटे पड़ने लगते हैं । कविता में भरोसा भी इसी गर्वबोध को ले कर आता है ।
 
कविता लचीलेपन के बरक्स एक कड़ेपन की ज़रूरत की वकालत करती है । कविता में यह लचीलापन दरअसल वह चालाकी है जो व्यक्ति में किताबों के जरिए प्रवेश करती है । पोथी वाली समझ पर कबीर भी कटाक्ष करते हैं और निदा फ़ाजली भी । विमलचन्द्र पाण्डेय कविता में इसके बरक्स जिस कड़ेपन की बात उठाते हैं वह भरोसे और मासूमियत का मजबूत पुल है । किताबें सब कुछ नहीं हैं । किताबों में लिखा तभी तक हमारे काम का है जब तक वह हमारे जीवन को बेहतर बना रहा होता है । ज़िन्दगी में यान्त्रिकता पैदा करने वाली किताबी समझ का मोल दो कौड़ी से ज्यादा क्या होगा ।
 
प्रात:काल फूलों का खिलना , उनकी नैसर्गिक महक ; पक्षियों का कलरव , उनका विरल संगीत ; नदी में उतरते हुए पैरों के जरिए महसूस होने वाली अनुभूति , घड़ियाल के भय से उपजी सिहरन और ऐसे ही तमाम सूक्ष्म अनुभवों की उपलब्धि सिर्फ़ किताबों से सम्भव नहीं । उसके लिए तो जीवन को उसकी सहजता में जीना होगा । खतरे उठाने होंगे । खतरों से बच निकलने के किताबे नुस्खे भी असल जिन्दगी में बहुत काम के तब तक साबित नहीं होते जब तक उनमें व्यवहारिक जीवनानुभवों की समझ भी शामिल नहीं हो जाती । कोरा सिद्धान्त मनुष्य को दिमागी राहत तो दे सकता है पर उसका विशेष भला नहीं कर सकता । जीवन की लड़ाइयों को लड़ कर ही जीता जा सकता है । कहना न होगा कि कविता में आने वाले फूल , चिड़ियाँ , नदी और घड़ियाल अपने आप में बड़े प्रतीक भी बनते हैं ।
 
किताबों से कवि का सीधा विरोध हो ऐसी बात नहीं है । द्रष्टव्य है कि किताबों से जो चालाकी मनुष्य को मिलती है उसे कवि गैरज़रूरी मानता है । किताबें मनुष्य को जटिल बनाती हैं । वह किताबों से जो कुछ सीखता है उसकी पूँजी से वह अपने जैसे दूसरे लोगों पर शासन करता है और इस प्रकार शोषक बनता है । कविता यहाँ सतर्क करती है कि किताबों का हाथ पकड़ कर सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने वाले लोग अपनी शक्ति के मद में मासूमियत का क़त्ल न कर दें । बड़ी खूबसूरती के साथ कविता के आखिर में कवि मासूमियत शब्द की जगह एक छह माह की बच्ची को रख देता है ।


हैरानी जीने के लिए एक ज़रूरी चीज़ है
हमें भरोसा करने की बीमारी है साहब जैसे ठगे जाने की आदत
और प्यार किए जाने का जुनून
आपमें पाया जाता होगा कुछ लचीलापन ज़रूर
आपकी मिट्टी सानते हुए कुछ मैदे का प्रयोग भी किया गया होगा
लेकिन हम कड़े हैं
और जब तक ऐसे हैं
तभी तक खड़े हैं
हम दुनिया को कौतुक की तरह देख़ते हैं मासूम चीज़ों पर खुश होने दीजिए हमें
हमने नहीं पढ़ी ढेर सारी किताबें जो नष्ट कर दें हमारी हैरानी
हैरानी जीने के लिए एक ज़रूरी चीज़ है
आपको सब पता होगा साहब !हमें सिर्फ़ इतना ही पता है कि सुबह फूल खिलते हैं और चिड़िया गाती हैं
इसे लिख कर नहीं सुंघाया या सुनाया जा सकता मेरी छह महीने की बेटी को
जब नदी में उतरते हैं तो कंपकपी होती है
जो किसी किताब में नहीं बतायी जा सकती
घड़ियालों को देखकर डरने दीजिए हमें
हमारी सिहरन के साथ छोड़ जाइए ये रास्ता
मत बताइए कि इसका थूथन कमज़ोर होता है जिसे तोड़ा जा सकता है आसानी से
हम लड़ाई को अन्तिम हथियार की तरह प्रयोग करते हैं साहब !हम जानकर क्या करेंगे कि सांप टेढ़े-मेढ़े दौड़ने से नहीं करेगा हमारा पीछा
आप मानते नहीं सरकार किताबों के अलावा किसी और की बात
पर विनती सुनें मेरी
और कुछ करें करें
सावधानी ज़रूर रखें जैसे पर्स में रख़ते हैं क्रेडिट कार्ड
महाशक्ति बनें तो फूलों के कुचले जाने का ध्यान रखें
गोलियां चलाएं तो ज़रा दूर जाकर निशाना लगाएं
इधर मेरी बेटी आराम कर रही है ।
 
 

4 comments:

  1. तिथि दानीJune 27, 2012 at 2:45 AM

    वर्तमान की कठोर वास्तविकता को माकूल शब्द देती कविता है। संवेदनशीलता तो है ही साथ ही पहली लाइन पढ़ने के बाद आगे पढ़े जाने का आकर्षण स्वतः पैदा हो जाती है। पढ़ते हुए जो लय पैदा होती है वह भी दिलचस्प है। आगे भी और कविताएँ पढ़ने का इंतज़ार है विमल जी।
    तिथि दानी

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  2. वर्तमान की कठोर वास्तविकता को माकूल शब्द देती कविता है। संवेदनशीलता तो है ही साथ ही पहली लाइन पढ़ने के बाद आगे पढ़े जाने का आकर्षण स्वतः पैदा हो जाता है। पढ़ते हुए जो लय पैदा होती है वह भी दिलचस्प है। आगे भी और कविताएँ पढ़ने का इंतज़ार है विमल जी।
    तिथि दानी

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  4. बहुत खुब नील जी।
    आज जब विद्वद्समाज अपनी विद्वता कठिनतम् शब्दों के प्रयोग को मानता है,
    आपने तो सरलम् शब्दों में आधुनिकता को अपनी जिन्दगी से दूर रख पुस्तकीय ग्यान की जगह अपने अनुभव से सीखने की बात लिखी है।
    हम दुनिया को कौतुक की तरह देख़ते हैं मासूम चीज़ों पर खुश होने दीजिए हमें
    हमने नहीं पढ़ी ढेर सारी किताबें जो नष्ट कर दें हमारी हैरानी
    हैरानी जीने के लिए एक ज़रूरी चीज़ है
    बहुत-बहुत धन्यवाद

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