Saturday, December 1, 2012

बीच बहस में कविता -20 : अशोक सिंह की कविता "मां की रसोई"



"वक़्त के चूल्हे पर चढ़ी है

जीवन की हांड़ी

खौल रहा है उसमें

आंसू का अदहन

अभी-अभी मां डालेगी

सूप भर दुख

और झोंकती अपनी उम्र

डबकाएगी घर-भर की भूख !"


हिन्दी में मां पर लिखी कविताओं की यूं तो कमी नहीं । लगभग एक मिथक की तरह मां के बिम्ब कविताओं में देखे जा सकते हैं । इन कविताओं का स्थायी भाव यह कि मां त्याग का ही पर्याय बन जाती है । कविता की दुनिया में मांएं जिस तरह से याद की जाती हैं उसमें भावुकता ज़्यादा स्थान घेरती है । मुझे कई बार ऐसा लगता है कि कविता में हम जिनका महिमा-मण्डन कर रहे होते हैं , इनके प्रति कहीं न कहीं एक अपराध-बोध हमारे भीतर काम कर रहा होता है । मुझे इस वक़्त ऐसी कोई कविता किसी महत्वपूर्ण कवि के नाम के साथ नहीं याद आ रही है जिसमें मां एक स्त्री और एक मनुष्य की तमाम दुर्बलताओं के साथ दिखाई देती हो । ऐसा शायद इसलिए होता होगा कि एक सर्वमान्य छवि या इमेज मां के बारे में हमारे मनोजगत में गहरे अंकित हुआ करती है । शास्त्र भी कहते हैं कि मां के ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता । वह जन्म देने वाली सत्ता है इसलिए स्तुत्य है , पूजनीय है ।


खैर , यहां सवाल यह है कि मां पर देखी सुनी कविताओं में इस एक छोटी सी कविता में ऐसा क्या है जो उसे बहुत सच और विश्वसनीय बनाता है । मुझे ऐसा लगता है कि चंद पंक्तियों मे एक "जीवन-दर्शन" बड़े ही प्रभावी ढंग से कविता में उपस्थित होता है जो स्त्री के समग्र जीवन का एक हाई-डेफ़िनिशन चित्र खींचता है । इतने कम शब्दों में एक मां और एक स्त्री के समूचे जीवन-व्यापार को कह पाना अशोक सिंह को एक बेहतर कवि साबित करता है । मां से भी बढ़कर यह एक स्त्री की कविता है । उसका जीवन ही एक हांड़ी है जो चूल्हे पर चढ़ी हुई है । वह हर हाल में एक इस्तेमाल की वस्तु में बदल जाती है । और स्पष्ट करूं तो वह एक उपकरण मात्र है । जिस तरह किसान कभी अपने हल और कुदाल का दुख नहीं पूछता , एक रसोइया भी उस हांड़ी का दुख नहीं पूछता और उसकी आपबीती कोई नहीं सुनता । वह आग पर चढ़ती है , तपती है तब घर के लिए अन्न पकते हैं । उसे थकने की इज़ाजत नहीं है । अगले ही जून उसे धो-मांज कर फिर चूल्हे पर चढ़ा दिया जाएगा । अदहन की जगह आंसू , जो कि उसके हिस्से में ही आते हैं । अनाज की जगह दुख जो उसी के हैं । जलावन की जगह अदद उम्र जो उसी की है । उफ़्फ़ ..इतना कारुणिक चित्र !


यह कैसी रसोई है कि जिसमें सूप भर अन्न के बदले सूप भर दुख पकाए जा रहे हैं । यह कौन सा चूल्हा है जिसमें काठ और कोयले की जगह मां की उम्र झोंकी जा रही है । यह मां की कैसी रसोई है जहां अदहन में पानी की जगह आंसू उबल रहे हैं । वक़्त के चूल्हे पर जीवन की हांड़ी चढ़ाने वाला यह कवि हिन्दी कविता में अभिव्यक्ति का एक ईमानदार हस्ताक्षर है । कहते हैं , ढाई आखर प्रेम के । एक सुन्दर कविता भी सिर्फ़ चार पंक्तियों मे संभव है ।


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